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यौन उत्पीडऩ साबित करने चोट होना जरूरी नहीं : मद्रास हाईकोर्ट

चेन्नई (ईएमएस)। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीडऩ की शिकार नाबालिग पीडि़ता के शरीर पर चोट के निशान नहीं हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि उससे ज्यादती नहीं हुई। इसके साथ ही निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने दोषी को 10 वर्ष सश्रम कारावास और पॉक्सो कानून के तहत सात साल सश्रम कैद की सजा कायम रखी। जस्टिस एस वैद्यनाथन ने आरोपी की इस दलील को खारिज कर दिया कि शारीरिक हिंसा के मामले में चोट का होना जरूरी है। उसके वकील ने कहा था कि चूंकि पीडि़ता के शरीर पर चोट का निशान नहीं है इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि यौन उत्पीडऩ हुआ। वहीं, जज ने कहा, यह गलत दलील है। नाबालिग लड़की को यह पता नहीं रहा होगा कि उसे किस मंशा से खींचा गया और क्यों छुआ गया। संभव है कि पीडि़ता ने बचने के लिए जोर नहीं लगाया, जिससे उसे चोट नहीं आई।

मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीडऩ की शिकार नाबालिग पीडि़ता के शरीर पर चोट के निशान नहीं हैं।

यौन उत्पीडऩ साबित करने चोट होना जरूरी नहीं: हाईकोर्ट
यौन उत्पीडऩ साबित करने चोट होना जरूरी नहीं: हाईकोर्ट

जज ने कहा, चोट न होने का मतलब यह नहीं कि यौन उत्पीडऩ नहीं हुआ। जबकि फोरेंसिक रिपोर्ट में पीडि़ता के कपड़ों पर सीमेन मिला है। इसके साथ ही कोर्ट ने दोषी की अपील खारिज कर निचली अदालत की सजा बरकरार रखी।2016 का मामलापीडि़ता की मां ने 27 मई 2016 को शिकायत की थी कि प्रकाश उनकी 12 साल की बेटी को अपने घर ले गया और यौन उत्पीडऩ किया। सुनवाई के बाद निचली अदालत ने प्रकाश को दोषी करार देते हुए आईपीसी के तहत दस साल सश्रम कारावास और पॉक्सो कानून के तहत सात साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ चलनी हैं।

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